श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक  2.5.79 
स माथुर-श्री-व्रज-भूमि-रूपस्
तत्रैव देवी मथुरा-पुरी च
वृन्दावनादि-व्रज-भूमिम् आत्म-
सारं विना स्थातुम् अपारयन्ती
 
 
अनुवाद
वही गोलोक मथुरा जनपद की दिव्य व्रजभूमि का रूप धारण कर लेता है। और मथुरा नगरी भी वहीं है, जो अपने सार—वृंदावन और व्रजभूमि के अन्य वनों—से अलग नहीं रह पाती।
 
That same Goloka takes the form of the divine Vrajabhumi of the Mathura district. And the city of Mathura is also there, inseparable from its essence—Vrindavan and the other forests of Vrajabhumi.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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