श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  2.5.76 
अहो लौकिक-सद्-बन्धु-
भावं च स्तौमि येन हि
गौरवादेर् विलोपेन
कृष्णे सत्-प्रेम तन्यते
 
 
अनुवाद
ओह, मैं एक साधारण मित्र के रूप में कृष्ण की मनोदशा की प्रशंसा करता हूँ, जो उनके भक्तों के सम्मान और श्रद्धा को दूर कर देती है और उनके प्रति उनके शुद्ध प्रेम को बढ़ाती है!
 
Oh, I admire Krishna's mood as an ordinary friend, which removes the respect and reverence of His devotees and increases His pure love for them!
तात्पर्य
श्री नारद के द्वारा अभी-अभी कही गई बात सुनकर कुछ वैष्णव इस बात को लेकर संशय में रह सकते हैं कि ईश्वर का प्रेम अपने पूर्ण क्षमता से तभी विकसित हो सकता है जब सर्वोच्च भगवान की महानता का विशिष्ट ज्ञान हो, न कि सांसारिक सम्बन्धों में उनके स्वरूप की अवधारणा से, जैसे पुत्र के रूप में। वास्तव में, ऐसे भक्त यह तर्क दे सकते हैं कि भगवान के व्यक्तित्व को ऐसे सम्बन्धों में देखना एक गंभीर त्रुटि है। आख़िरकार, श्रीमद भागवत (10.85.19) में कृष्ण के स्वयं के पिता श्री वासुदेव ने प्रार्थना की:

तत ते गतोंसम्‍यरणं अद्य पदा‍रविन्‍दम्‍

आपन्‍न संस्‍कृति भयाप‍हम्‍ आर्त बन्‍धो

एतावता‍लम्‍ इंद्रिय ला‍लसना

मर्त्यात्‍म दृक्‍ त्वयि‍ परे यत अपत्‍य बुद्धिः

“इसलिए, हे संकटग्रस्तों के मित्र, मैं अब आपके चरण कमलों की शरण लेने आया हूं- वही चरण कमल जो सांसारिक अस्तित्व के सभी भयों को दूर करते हैं जो लोग उसके प्रति समर्पित हैं। बहुत हुआ! इंद्रिय भोग के लिए तरसने के साथ, जो मुझे इस नश्वर शरीर के साथ पहचान करता है और तुम्हें, सर्वोच्च को, अपने बच्चे के रूप में सोचता है।”

इस प्रार्थना में, वासुदेव उस भ्रम से मुक्त होने के लिए भीख मांगता है जो उसे यह कल्पना करने के लिए मजबूर करता है कि ईश्वर उसका पुत्र है। वासुदेव को सलाह दी जा सकती है, "तुम बहुत खुश हो, तो तुम शिकायत क्यों कर रहे हो?" लेकिन वह इस विचार का वर्णन करके इस विचार का मुकाबला करता है कि वह कितना दयनीय है, जिसमें इंद्रिय भोग के लिए लालच से वह सोचता है कि वह शरीर है और सर्वोच्च भगवान उसका पुत्र है।

वासुदेव भी विष्णु पुराण (5.20.99) में कृष्ण से कहते हैं:

सपह्नवं माम मनो

यद एतत्‍ त्वयि जा‍यते

देवक्‍याश्‍ च आत्‍मज प्रीत्‍या

तद अत्‍यंत विडं‍ब‍नम्‍

"यह कि देवकी और मैं दोनों ही आपको अपने बच्‍चे की तरह प्रेम करने में चकित हैं, यह बहुत ही बेतुका है!" वासुदेव को लगता है कि उन्हें सर्वोच्च भगवान को अपना पुत्र मानने की हिम्मत करने के लिए चुटकुलों का पात्र होना चाहिए।

लेकिन यहाँ नारद बताते हैं कि यह असाधारण दृष्टिकोण और व्यवहार, भले ही वे सांसारिक मानवीय संबंधों के पैटर्न का पालन करते प्रतीत होते हों, कृष्ण के लिए सबसे उत्तम प्रेम की सीमा का विस्तार करते हैं। इस प्रकार की भक्ति सेवा कैसे काम करती है, यह समझने की कुंजी यह समझना है कि यह सर्वोच्च भगवान के प्रति सम्मान, भय और श्रद्धा विश्वास के प्रतिबंधों को दूर करती है। वैकुण्ठ में विस्मय और श्रद्धा अपरिहार्य हो सकता है, लेकिन वे केवल कृष्ण और उनके अंतरंग भक्तों के बीच प्रेम की अभिव्यक्ति को रोकते हैं। इस पर पहले ही श्री बृहद भागवतामृत में चर्चा की जा चुकी है और इसे बाद में और भी स्पष्ट किया जाएगा।

गोपा कुमार नारद द्वारा कही गई बातों से समझते हैं कि सबसे लाभकारी और समझदार काम वही करना है जो भगवान के प्रति उनके शुद्ध प्रेम को मजबूत करेगा। श्री वासुदेव इस बात का विलाप कर रहे थे कि उन्होंने अपना ध्यान इस विचार पर केंद्रित कर लिया था कि भगवान उनका पुत्र है, न कि श्री नंद और यशोदा की तरह केवल उनके लिए स्नेह में कार्य करना। या वैकल्पिक रूप से, वासुदेव, एक अत्यंत विनम्र वैष्णव के रूप में, उस आत्म-असंतोष से पीड़ित थे जो स्वाभाविक रूप से तब उत्पन्न होता है जब भक्ति तीव्र हो जाती है। वह निश्चित रूप से एक पूर्ण भक्त हैं जिसे भगवान का सभी आशीर्वाद प्राप्त है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)