श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  2.5.72 
युक्तं तद् एका प्रभु-पाद-पद्मयोः
सप्रेम-भक्तिर् भवताम् अपेक्षिता
भक्त-प्रियस्यास्य च भक्त-कामित-
प्रपूरणं केवलम् इष्टम् उत्तमम्
 
 
अनुवाद
यह सर्वथा उचित है कि आप भक्तजन केवल प्रेम-भक्ति, भगवान के चरणकमलों की शुद्ध प्रेममयी भक्ति सेवा, का ही ध्यान रखें। भगवान, जो अपने भक्तों पर अत्यंत स्नेह करते हैं, के प्रति ऐसी प्रेम-भक्ति उनकी सभी आकांक्षाओं को पूर्ण करती है और यही उनका अंतिम लक्ष्य है।
 
It is entirely appropriate that you devotees concentrate only on prema-bhakti, pure loving devotional service to the Lord's lotus feet. Such loving devotion to the Lord, who showers His devotees with immense affection, fulfills all their aspirations and is their ultimate goal.
तात्पर्य
यदि कृष्ण अपने भक्तों के साथ आध्यात्मिक और भौतिक दोनों लोकों में वस्तुतः एक ही तरह से व्यवहार करते हैं, तो वैकुण्ठ के बारे में क्या खास है? नारद का उत्तर है कि प्रभु और उनके भक्तों के बीच संबंधों की गुणवत्ता में भौतिक और आध्यात्मिक दुनिया के बीच कोई व्यावहारिक अंतर नहीं है। किसी भी क्षेत्र में भगवान और भक्त अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति प्राप्त करते हैं, इसलिए वे जो कुछ भी करते हैं वह उस समय और स्थान के लिए उपयुक्त है जिसमें वे होते हैं। भक्तों के लिए, सबसे महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है उनके चरणों की हमेशा शुद्ध प्रेम से सेवा करने का अवसर। और इसी तरह भगवान के व्यक्तित्व के लिए, सबसे महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है अपने भक्तों को संतुष्ट करना।

चूँकि संस्कृत में संज्ञाएँ एकवचन, द्विवचन या बहुवचन हो सकती हैं और चूँकि भवताम् ("आपके द्वारा") शब्द बहुवचन है, यहाँ शब्द इंगित करता है कि नारद न केवल उद्धव और गोप-कुमार से बात कर रहे हैं बल्कि प्रभु के सभी पूर्ण रूप से समर्पित सेवकों से बात कर रहे हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)