श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.5.66 
उद्धवः स-स्मितं प्राह
किं ब्रूयां सा न मादृशाम्
अपेतेति किलास्माकं
प्रभोर् अप्य् अपयाति न
 
 
अनुवाद
मुस्कुराते हुए उद्धव ने उनसे कहा, "मैं क्या कह सकता हूँ? मेरे जैसा व्यक्ति स्वयं को क्षत्रिय समझना कैसे बंद कर सकता है, जबकि हमारे भगवान भी स्वयं को क्षत्रिय नहीं मानते?"
 
Smiling, Uddhava said to him, "What can I say? How can a person like me stop considering himself a Kshatriya, when even our Lord does not consider himself a Kshatriya?"
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas