श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  2.5.65 
नारदो नितराम् उच्चैर्
विहस्यावदद् उद्धवम्
न वैकुण्ठे ’प्य् अपेतास्मिन्
क्षत्रियत्व-मतिस् तव
 
 
अनुवाद
नारद बहुत जोर से हंसे और उद्धव से बोले, "यहां वैकुंठ में भी आप स्वयं को क्षत्रिय समझने से नहीं रोक सकते!"
 
Narada laughed very loudly and said to Uddhava, “Even here in Vaikuntha you cannot stop yourself from considering yourself a Kshatriya!”
तात्पर्य
पदार्थ के लोक में, विशेष रूप से भारत-वर्ष में, जाति और व्यवसायों का भेद प्रचलित है, लेकिन वैकुण्ठ में इन भेदों पर ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि वहाँ हर किसी का शरीर विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, आदि की स्थिति शरीर के नाम हैं जो सीमित और अस्थायी हैं, लेकिन वैकुण्ठ के शरीर पदार्थ के स्वभाव द्वारा लगाई गई सीमाओं के अधीन नहीं होते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)