श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  2.5.65 
नारदो नितराम् उच्चैर्
विहस्यावदद् उद्धवम्
न वैकुण्ठे ’प्य् अपेतास्मिन्
क्षत्रियत्व-मतिस् तव
 
 
अनुवाद
नारद बहुत जोर से हंसे और उद्धव से बोले, "यहां वैकुंठ में भी आप स्वयं को क्षत्रिय समझने से नहीं रोक सकते!"
 
Narada laughed very loudly and said to Uddhava, “Even here in Vaikuntha you cannot stop yourself from considering yourself a Kshatriya!”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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