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श्लोक 2.5.6  |
वैकुण्ठ-नाथस्य विचित्र-माधुरी-
सारेण तेनास्त्य् अखिलेन सेवितः
केनापि केनाप्य् अधिकाधिकेन सो
’मुष्माद् अपि श्री-भर-सञ्चयेन च |
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| अनुवाद |
| उन्हें वैकुण्ठ के स्वामी के सभी सर्वोत्कृष्ट आकर्षणों से तथा अनेकों महान् वैभवों से सेवा प्राप्त हुई, जो स्वयं भगवान के पास भी नहीं हैं। |
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| He was served with all the best attractions of the Lord of Vaikuntha and many great opulences, which even the Lord Himself does not possess. |
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