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श्लोक 2.5.58-59  |
श्री-नारद उवाच
उद्धवायम् अहो गोप-
पुत्रो गोवर्धनोद्भवः
मादृशां त्वादृशानां च
मृग्यन् वस्तु नु दुर्लभम्
इतस् ततो भ्रमन् व्यग्रः
कदाचिद् अपि कुत्रचित्
नातिक्रामति चित्तान्तर्-
लग्नं तं शोकम् आर्ति-दम् |
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| अनुवाद |
| श्री नारद बोले: देखो उद्धव! गोवर्धन पर्वत पर जन्मा यह ग्वालपुत्र तुम्हारे और मेरे जैसे लोगों के लिए अप्राप्य वस्तु की खोज में है। वह अत्यन्त व्याकुल होकर इधर-उधर भटक रहा है, और अपने हृदय में बसी हुई वेदना से कभी मुक्त नहीं हो पा रहा है। |
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| Sri Narada said: Look, Uddhava! This cowherd's son, born on Mount Govardhana, is searching for something unattainable for people like you and me. He wanders here and there in great distress, never able to free himself from the pain that resides in his heart. |
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