श्री नारद बोले: देखो उद्धव! गोवर्धन पर्वत पर जन्मा यह ग्वालपुत्र तुम्हारे और मेरे जैसे लोगों के लिए अप्राप्य वस्तु की खोज में है। वह अत्यन्त व्याकुल होकर इधर-उधर भटक रहा है, और अपने हृदय में बसी हुई वेदना से कभी मुक्त नहीं हो पा रहा है।
Sri Narada said: Look, Uddhava! This cowherd's son, born on Mount Govardhana, is searching for something unattainable for people like you and me. He wanders here and there in great distress, never able to free himself from the pain that resides in his heart.
तात्पर्य
यह साधक, एक ग्वाले का पुत्र, भौतिक और अध्यात्मिक दुनिया भर में भटकता रहा है, उसका हृदय अवर्णनीय दर्द से भरा हुआ है, और अब उसने उद्धव के घर में शरण ली है। वह शांति प्राप्त करने में सक्षम नहीं हुआ है, क्योंकि उसका वांछित लक्ष्य नारद और उद्धव जैसे महान वैष्णवों की पहुँच से परे है। गोप-कुमार की इतनी असंभावित महत्वाकांक्षा क्यों है, नारद ने गोवर्धनोद्भवः ("गोवर्धन पर जन्मा") वाक्यांश से व्याख्या की है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥