श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.5.51 
श्री-नारद उवाच
गोप-बालक एवासि
सत्यम् अद्यापि कौतुकी
पूर्वम् एव मयोद्दिष्टम्
एतद् अस्ति न किं त्वयि
 
 
अनुवाद
श्री नारद बोले: हे प्यारे ग्वाले, तुम हमेशा से ही जिज्ञासु रहे हो, और अब भी हो। क्या मैंने तुम्हें यह सब पहले नहीं समझाया था?
 
Sri Narada said: O dear cowherd, you have always been curious, and you still are. Didn't I explain all this to you before?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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