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श्लोक 2.5.48  |
एवम् उद्धव-गेहे मे
दिनानि कतिचिद् ययुः
यदि स्यात् को ’पि शोकस् तं
संवृणोम्य् अवहित्थया |
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| अनुवाद |
| उद्धव के घर में इस प्रकार बिताए कई दिनों में यदि मुझे कोई दुःख होता तो मैं उसे प्रसन्नता का दिखावा करके छिपा लेता। |
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| During the many days spent in Uddhava's house, if I felt any sadness, I would hide it by pretending to be happy. |
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