vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री बृहत् भागवतामृत
»
खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
»
अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)
»
श्लोक 47
श्लोक
2.5.47
तस्य वाग्-अमृतैस् तैस् तैः
कृपाभिव्यञ्जनैर् अपि
भवेत् सुख-विशेषो यो
जिह्वा स्पृशतु तं कथम्
अनुवाद
उनके अमृतमय वचनों से उनकी करुणा प्रकट हुई। मेरी जीभ उनके द्वारा उत्पन्न अद्वितीय सुख को कैसे छू सकती है?
His compassion was revealed in His nectar-like words. How can my tongue touch the unparalleled happiness He evokes?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×