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श्लोक 2.5.34  |
प्रस्थायोद्धव-सङ्गत्या
स्व-प्रभुं तं विलोकयन्
नाशकं हर्ष-वैवश्यात्
किञ्चित् कर्तुं परं ततः |
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| अनुवाद |
| अगले दिन मैं उद्धव के साथ गयी और अपने प्रभु के दर्शन किये, किन्तु मैं इतनी प्रसन्नता से विह्वल थी कि उससे अधिक कुछ कर पाने में असमर्थ थी। |
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| The next day I went with Uddhava and saw my Lord, but I was so overwhelmed with joy that I was unable to do anything more. |
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