श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.5.31 
महा-प्रसादम् उच्छिष्टं
भुक्त्वा स्व-गृहम् आनयत्
भगवद्-भाव-विज्ञो ’साव्
उद्धवो मां बलाद् इव
 
 
अनुवाद
उद्धव भगवान के आनंद को भली-भाँति जानते थे। इसलिए उन्होंने कृष्ण के महाप्रसाद का कुछ अंश खाया और फिर मुझे ज़बरदस्ती अपने घर ले गए।
 
Uddhava knew well the Lord's joy. So he ate some of Krishna's great offerings and then forcibly took me to his home.
तात्पर्य
कृष्ण विचार कर रहे थे कि राजसी संपन्नता से भरे महल में गोपा-कुमार पूरी तरह सहज महसूस नहीं कर पाएगा। इसलिए उन्होंने फैसला किया कि गोपा-कुमार के लिए उद्धव के घर उद्धव के साथ रहना बेहतर होगा क्योंकि उद्धव का व्रजवासियों के साथ एक अनूठा स्नेह था। उद्धव को पता था कि प्रभु क्या सोच रहे हैं, प्रभु को कुछ भी कहने की जरूरत नहीं थी। इसलिए जैसे ही उद्धव ने कृष्ण के कुछ अवशेष खाए, वह गोपा-कुमार को बिना किसी बात के अपने साथ ले गए। चूंकि गोपा-कुमार अभी भी स्तब्ध थे, इसलिए उद्धव उन्हें घसीट कर ले गए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)