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श्लोक 2.5.31  |
महा-प्रसादम् उच्छिष्टं
भुक्त्वा स्व-गृहम् आनयत्
भगवद्-भाव-विज्ञो ’साव्
उद्धवो मां बलाद् इव |
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| अनुवाद |
| उद्धव भगवान के आनंद को भली-भाँति जानते थे। इसलिए उन्होंने कृष्ण के महाप्रसाद का कुछ अंश खाया और फिर मुझे ज़बरदस्ती अपने घर ले गए। |
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| Uddhava knew well the Lord's joy. So he ate some of Krishna's great offerings and then forcibly took me to his home. |
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