श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.5.30 
कुमार-मण्डली-मध्ये
निवेश्य निजम् अग्रजम्
परिवेशयता स्वेन
पूर्व-वद् बाल्य-लीलया
 
 
अनुवाद
भगवान ने अपने बड़े भाई को बालकों के बीच बैठाया और उन्हें भोजन कराया, जैसा कि उन्होंने पहले अपनी बाल लीलाओं में किया था।
 
The Lord made His elder brother sit among the children and fed them, as He had done earlier in His childhood pastimes.
तात्पर्य
युवा यदुओं के वृत्त के बीच भगवान बलराम कमल की मंजरी की तरह विराजित थे। इससे पहले कृष्ण और बलराम वृंदावन में ग्वाल बालकों की संगति में इसी तरह दोपहर का भोजन का आनँद ले चुके थे, जिसमें मजाक और हंसी भी शामिल थी। श्रीमद् भागवतम (१०.१३.११) के दसवें सर्ग में इन लीलाओं का वर्णन है:

बिभ्रद वेणुं जठर-पटयोः शृंग-वेत्रे च कक्षे

वामे पाणौ मसृण-कवलं तत्फलाँन्य अगुलिषु

तिष्ठन् मध्ये स्व-परिसुहृदो हासयन नर्मभिः स्वैः

स्वर्ग लोके मिषति बुभुजे यज्ञ-भुग बाल-केलिः

"कृष्ण यज्ञ-भुग हैं- अर्थात वे केवल यज्ञ की भेंट चढ़ाई हुई चीजें ही खाते हैं- परंतु अपनी बाल लीलाओं का प्रदर्शन करने के लिए वे अपनी कमर और अपने दाहिने तरफ़ कसे हुए कपड़े के बीच में अपनी बाँसुरी को ठूँस कर बैठे, और बाएँ तरफ़ अपने सींग से बने तुरही और गाय चराने की लाठी रखी। अपने हाथ में दही और चावल से बने एक बहुत ही स्वादिष्ट पदार्थ को, तथा अपनी उंगलियों के बीच उचित फलों के टुकड़ों को पकड़ कर वे कमल की मंजरी की तरह बैठे हुए थे, अपने सभी मित्रों की तरफ देख रहे थे, व्यक्तिगत रूप से उनसे मजाक कर रहे थे और उन सबके बीच हँसी-खुशी का माहौल बना रहे थे, क्योंकि वे खा रहे थे। उस समय, स्वर्ग के वासी भी यह देखकर दंग रह गए थे कि जो भगवान केवल यज्ञ में ही भोजन ग्रहण करते हैं, वे आज जंगल में अपने मित्रों के साथ भोजन कर रहे थे। दसवें सर्ग के इस चित्रण में, कृष्ण अपने मित्रों के साथ भोजन कर रहे हैं न कि भोजन परोस रहे हैं, क्योंकि इस दिन उनके बड़े भाई, बलराम, उपस्थित नहीं थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)