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श्लोक 2.5.29  |
दैवकी-नन्दनेनाथ
तेन किञ्चित् स्व-पाणिना
भोजितो ’हं स्वयं पश्चाद्
भुक्तं सन्तोषणाय मे |
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| अनुवाद |
| देवकी के उस प्रिय पुत्र ने मुझे अपने हाथ से कुछ खिलाया और उसके बाद ही मेरी तृप्ति के लिए स्वयं कुछ खाया। |
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| That beloved son of Devaki fed me with his own hands and only after that did he eat something himself to satisfy me. |
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