श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.5.28 
वृत्ते भोजन-काले ’पि
भोक्तुम् इच्छाम् अकुर्वता
मातॄणाम् आग्रहेणैव
कृत्यं माध्याह्णिकं कृतम्
 
 
अनुवाद
दोपहर के भोजन का समय हो गया था, लेकिन प्रभु को खाने की इच्छा नहीं थी। अपनी माताओं के आग्रह पर ही उन्होंने अपने दोपहर के कार्य किए।
 
It was time for lunch, but the Lord did not feel like eating. He continued his afternoon chores only at his mother's insistence.
तात्पर्य
गोकुल का स्मरण करने से कृष्ण जी को वियोग की पीड़ा से भूख मिट गई। परन्तु उनकी माँएँ, केवल देवकी ही नहीं, वसुदेव की अन्य पत्नियाँ भी बिना खाये उनको जाने नहीं देती। पहले उनको मध्याह्न स्नान और अन्य नित्य कर्म करने पड़े।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)