श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 260
 
 
श्लोक  2.5.260 
केनचिन् नीयमानो ’स्मि
कुत्रापीति वितर्कयन्
दृशाव् उन्मील्य पश्यामि
कुञ्जे ’स्मिन्न् अस्मि सङ्गतः
 
 
अनुवाद
मुझे यह महसूस हुआ कि कोई मुझे कहीं और ले गया है, फिर मैंने अपनी आँखें खोलीं और देखा कि मुझे इस उपवन में लाया गया है।
 
I felt as if someone had taken me somewhere else, then I opened my eyes and saw that I had been brought to this grove.
तात्पर्य
आँखें बंद होने के कारण गोप-कुमार को नहीं दिखाई दे रहा था कि उन्हें कौन ले जा रहा है। यदि उन्होंने देखा होता कि उन्हें कृष्ण पृथ्वी पर गोकुल में छोड़ने के लिए ले जा रहे हैं, तो वह कभी भी द्वारका में अपने स्वामी का साथ छोड़कर गोलोक, जो अंतिम गंतव्य है, नहीं जा पाते। उद्धव ने भी गोप-कुमार को द्वारका छोड़कर जाने से पहले कृष्ण से मिलने से रोक दिया था क्योंकि यदि गोप-कुमार कृष्ण से मिलते, तो गोप-कुमार का गोकुल वृंदावन चले जाना असंभव हो जाता। कृष्ण और उनके भक्त मिलकर गोप-कुमार की अंतिम सफलता को सुनिश्चित करने की साजिश कर रहे थे।
 
इस प्रकार श्रील सनातन गोस्वामी के बृहद-भागवतामृत के भाग दो का पाँचवाँ अध्याय, “प्रेम (भगवान का प्रेम)”, समाप्त होता है।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)