श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.5.26 
तं श्री-यशोदाखिल-गोप-सुन्दरी-
गोपार्भ-वर्गैर् इव भूषितं त्व् अहम्
पश्यन् समक्षं धृत-वेणुम् आत्मनो
ध्येयं पुनर् हर्ष-भरेण मोहितः
 
 
अनुवाद
परन्तु मैंने भगवान को अपने सम्मुख प्रकट होते देखा, मानो वे श्रीयशोदा, समस्त सुन्दरी गोपियों और अनेक ग्वालबालों की संगति से सुशोभित हों। अपने ध्यान के लक्ष्य को हाथ में बाँसुरी लिए देखकर मैं पुनः प्रसन्नता से विह्वल हो गया।
 
But I saw the Lord appear before me, adorned with the company of Sri Yashoda, all the beautiful gopis, and numerous cowherd boys. Seeing the object of my meditation, flute in hand, I was again overwhelmed with joy.
तात्पर्य
अपने ध्यान में, गोप-कुमार हमेशा श्री मदन-गोपालदेव की पूजा करते थे, जो कि द्वारका में भगवान कृष्ण से अलग हमेशा अपनी बांसुरी रखते हैं। लेकिन अब कृष्ण ने गोप-कुमार की बांसुरी अपने हाथ में ली हुई थी और उसे अभी भी पकड़े हुए थे। उस अजीब परिस्थिति ने गोप-कुमार में एक विशेष उन्माद उत्पन्न कर दिया, जिस भाव में उन्हें देवकी माता यशोदा के रूप में, कृष्ण की रानियों को गोपियों के रूप में और प्रद्युम्न और सांब जैसे भगवान के पुत्रों को युवा ग्वाल बालकों के रूप में दिखाई दिया। गोप-कुमार के आनंदोन्मत्त होने की स्थिति में, कृष्ण का अपना सौंदर्य अपरिवर्तित रहा और श्री बलराम की माता रोहिणी का भी जो वृंदावन और द्वारका दोनों में एक ही व्यक्तित्व की है। कृष्ण की एकमात्र विशेषता जो यहाँ द्वारका में भिन्न थी, वह पवित्र यज्ञोपवीत धागा था जिसे दीक्षा के समय सांदीपनि मुनि ने उन्हें दिया था, लेकिन यह धागा कृष्ण के ऊपरी कपड़े से छिपा हुआ था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)