श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 256
 
 
श्लोक  2.5.256 
न साक्षात् सेवया तस्य
या प्रीतिर् इह जायते
तद्-व्रज-स्थान-वासेन
सा हि सम्पद्यते दृढा
 
 
अनुवाद
यहाँ द्वारका में भगवान की प्रत्यक्ष सेवा से भी वह प्रेम उत्पन्न नहीं होता जो केवल व्रज भूमि में निवास करने से दृढ़तापूर्वक विकसित हो जाता है।
 
Even direct service to the Lord here in Dwaraka does not generate the love that is firmly developed simply by residing in Vraja land.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)