श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 252
 
 
श्लोक  2.5.252 
तद् गच्छतु भवान् शीघ्रं
स्व-दीर्घाभीष्ट-सिद्धये
माधुरीं व्रज-भूमिं तां
धरा-श्री-कीर्ति-वर्धिनीम्
 
 
अनुवाद
अब तुम शीघ्र ही उस परम मधुर व्रजभूमि में जाओ, जो पृथ्वी की कीर्ति और शोभा को बढ़ाने वाली है। वहाँ जाकर अपनी उस अभिलाषा को पूर्ण करो जो तुमने इतने समय से धारण की है।
 
Now, quickly go to that most sweet land of Vraja, which enhances the earth's fame and splendor. Go there and fulfill the desire you have long cherished.
तात्पर्य
वृन्दावन में पृथ्वी पर गोप-कुमार अंततः श्री मदन गोपाल के चरण कमलों को देखेंगे। वृन्दावन पृथ्वी की सुंदरता और प्रतिष्ठा को कैसे बढ़ाता है, इसका वर्णन वृन्दावन की गोपियां करती हैं:

वृन्दावनं सखी भुवो वितानोति कीर्तिं

यद् देवकी-सुत-पदाम्बुज-लब्धा लक्ष्मी

गोविन्द-वेणुं अनु मत्त मयूर नृत्यं

प्रेक्ष्यद्रि-सान् ववरता्न्य समस्ता सत्त्वं

"हे सखी, व्रजभूमि पृथ्वी की कीर्ति का विस्तार कर रहे हैं, इसने देवकी के पुत्र कृष्ण के चरण-कमलों के खजाने को प्राप्त किया है। पहाड़ी की चोटी से देखे जाने पर, जब मोर गोविंद की बाঁसुरी की धुन पर झूमकर नाचते हैं तो इसको देखकर अन्य प्राणी सभी झूमने लगते हैं।" (भागवतम् 10.21.10)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)