श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 251
 
 
श्लोक  2.5.251 
यया हृत्-क्षोभ-राहित्यान्
महा-कौतुकतो ’पि ते
वृत्तं भाव-विशेषेण
तत्-तल्-लोके ’च्युतेक्षणम्
 
 
अनुवाद
आपकी भोली-भाली प्रवृत्ति ने आपको एक सरल हृदय की व्याकुल जिज्ञासा का अनुभव कराया। इस प्रकार आपने प्रत्येक लोक में भगवान अच्युत की खोज का विशेष आनंद प्राप्त किया।
 
Your innocence made you experience the restless curiosity of a simple heart. Thus, you experienced the special joy of searching for Lord Acyuta in every planet.
तात्पर्य
कष्ट कभी-कभी स्नेह को बढ़ा सकता है, लेकिन अज्ञान का क्या उपयोग है? नारद उत्तर देते हैं कि महर-लोक और अन्य ग्रहों पर गोपा-कुमार की सरलता ने उन्हें भगवान के व्यक्तित्व को बहुत ही शुद्ध भाव से देखने की अनुमति दी। ज्ञान से भरा मन आलोचनात्मक विचारों से आसानी से उत्तेजित हो जाता है और एक साधारण व्यक्ति के मन की तरह उत्साह का आनंद लेने के लिए स्वतंत्र नहीं होता है। यदि गोपा-कुमार अधिक परिष्कृत होते, तो वह सर्वोच्च भगवान को उनके विभिन्न पहलुओं में उतने ईमानदार स्नेह के साथ नहीं खोज पाते और भगवान के दर्शन से उतना आनंद नहीं ले पाते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)