श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 247
 
 
श्लोक  2.5.247 
श्री-गोप-कुमार उवाच
परितः पुनर् आलोक्य
लक्षणानि शुभानि सः
हृष्टो माम् आह सर्व-ज्ञो
नारदो वैष्णव-प्रियः
 
 
अनुवाद
श्रीगोपकुमार ने कहा: नारदजी ने पुनः चारों ओर देखा। शुभ लक्षण देखकर, सर्वज्ञ ऋषि तथा वैष्णवों के प्रिय मित्र ने प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहा।
 
Sri Gopakumara said: Narada looked around again. Seeing the auspicious signs, the omniscient sage and dear friend of the Vaishnavas happily spoke to me.
तात्पर्य
दोबारा बोलने से पहले नारद ने अपने चारों ओर देखा और पक्षियों को चहचहाते हुए और अन्य शुभ शगुन को देखा। वह सिर्फ़ गोप-कुमार के लिए सबसे अच्छा चाहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)