जब दैन्य पूर्णतः परिपक्व हो जाता है, तो प्रेम असीम रूप से प्रकट होता है। और इस प्रकार हम दैन्य और प्रेम को एक ऐसे संबंध में कार्य करते हुए देखते हैं जिसमें दोनों ही कारण और प्रभाव दोनों हैं।
When humility fully matures, love manifests infinitely. And thus we see humility and love working in a relationship in which both are cause and effect.
तात्पर्य
यदि प्रेम को सभी भक्ति पूर्ण प्रयासों का अंतिम परिणाम माना जाता है, तो दैन्य को प्रेम का परिणाम कैसे माना जा सकता है? उत्तर में: हाँ, प्रेम का अंतिम लक्ष्य होता है, परन्तु दैन्य पूर्णतः प्रेम से भिन्न नहीं है। दैन्य, प्रेम का एक अभिन्न अंग है, और दोनों एक दूसरे का पोषण करते हैं। यह सोचना कि पूर्णता प्राप्त करने का एक ना एक स्तर अवश्य है, इसलिए जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को कोई नहीं पा सकता, यह एक गलतफहमी है। प्रेम के क्रमिक विकास से यह नहीं पता चलता है कि कोई लक्ष्य नहीं है बल्कि कि आध्यात्मिक जीवन में अंतहीन विविधता है। श्री गोपीनाथ के चरणकमलों के प्रति शुद्ध प्रेम होने से, जिस फल की प्राप्ति होती है वह श्री गोलोक है; उस प्राप्ति से, श्री गोपीनाथ के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं; उस प्रत्यक्ष दर्शन से, उनकी विशेष कृपा होती है; उस कृपा से, विरह भाव की सर्वोच्च परमानंद की प्राप्ति होती है, इत्यादि। यह अंतहीन क्रम कोई त्रुटि नहीं है बल्कि आध्यात्मिक विविधता का विकास है। वैकुंठ में भी, गोलोक के बारे में क्या कहना, भक्ति सेवा का आनंद एक अनंत विविधता में विकसित होता है जो कि मुक्ति के सुख को लज्जित करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥