श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 222
 
 
श्लोक  2.5.222 
येनासाधारणाशक्ता-
धम-बुद्धिः सदात्मनि
सर्वोत्कर्षान्विते ’पि स्याद्
बुधैस् तद् दैन्यम् इष्यते
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान लोग दैन्य को उस अवस्था के रूप में परिभाषित करते हैं जिसमें व्यक्ति स्वयं को सदैव असाधारण रूप से अयोग्य और निम्न समझता है, भले ही वह सभी श्रेष्ठताओं से संपन्न हो।
 
Wise people define misery as a state in which a person always considers himself exceptionally unworthy and inferior, even though he is endowed with all the excellences.
तात्पर्य
नारद की दैन्य की अपनी परिभाषा, शब्द के अन्य संभावित अर्थों, जैसे "गरीबी," "दान स्वीकार न करके निःस्वार्थ बनना" और "अहंकार से मुक्त होना" से उनके शब्द के प्रयोग को अलग करती है। कोई यह कह सकता है कि अपने आपको बहुत पतित समझने का गुण उन लोगों में भी देखा जा सकता है जो केवल आलसी हैं या जो शुभ कामों को त्याग देते हैं या पापपूर्ण कृत्यों में लिप्त होते हैं। इसलिए नारद बताते हैं कि जिसके पास वास्तव में दैन्य है वह सभी अच्छे गुणों से संपन्न है; उदाहरण के लिए, ऐसा व्यक्ति सकारात्मक और नकारात्मक नियमों का पालन करता है, वह मिथ्या अहंकार से मुक्त होता है और उसे भौतिक जीवन का स्वास्थ्यप्रद भय होता है। इसके अलावा, हालांकि नारद ऐसा नहीं कहते हैं, पारलौकिक दैन्य अत्यधिक उत्तेजना की स्थिति है जिससे आँसू और अन्य हर्षोल्लासपूर्ण प्रकोप हो सकते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)