श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 208
 
 
श्लोक  2.5.208 
स्वस्योद्धवस्य ते ’प्य् एष
कृत्वाहं शपथं ब्रुवे
दुःसाध्यं तत् पदं ह्य् अत्र
तत्-साधनम् अपि ध्रुवम्
 
 
अनुवाद
मैं अपनी ओर से तथा उद्धव की ओर से आपको प्रमाणित करता हूँ कि यहाँ से भगवान के धाम तक पहुँचना वास्तव में सबसे कठिन है - तथा उस तक पहुँचने का अनुशासन भी उतना ही कठिन है।
 
I certify to you on my own behalf and on behalf of Uddhava that reaching the abode of God from here is indeed the most difficult – and the discipline to reach there is equally difficult.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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