श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 201
 
 
श्लोक  2.5.201 
ललित-गति-विलास-वल्गु-हास-
प्रणय-निरीक्षण-कल्पितोरु-मानाः
कृतम् अनुकृतवत्य उन्मदान्धाः
प्रकृतिम् अगन् किल यस्य गोप-वध्वः
 
 
अनुवाद
"मेरा मन भगवान श्रीकृष्ण में स्थिर रहे, जिनकी प्रेममयी गतियों और मुस्कानों ने व्रजधाम की गोपियों को परम गौरव का अनुभव कराया। वे गोपियाँ अंध-आनंद में कृष्ण के कार्यों का अनुकरण करती रहीं और उनके समान बन गईं।"
 
"May my mind remain fixed on Lord Krishna, whose loving movements and smiles filled the gopis of Vrajdham with supreme pride. In blind joy, the gopis imitated Krishna's actions and became like him."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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