श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 201
 
 
श्लोक  2.5.201 
ललित-गति-विलास-वल्गु-हास-
प्रणय-निरीक्षण-कल्पितोरु-मानाः
कृतम् अनुकृतवत्य उन्मदान्धाः
प्रकृतिम् अगन् किल यस्य गोप-वध्वः
 
 
अनुवाद
"मेरा मन भगवान श्रीकृष्ण में स्थिर रहे, जिनकी प्रेममयी गतियों और मुस्कानों ने व्रजधाम की गोपियों को परम गौरव का अनुभव कराया। वे गोपियाँ अंध-आनंद में कृष्ण के कार्यों का अनुकरण करती रहीं और उनके समान बन गईं।"
 
"May my mind remain fixed on Lord Krishna, whose loving movements and smiles filled the gopis of Vrajdham with supreme pride. In blind joy, the gopis imitated Krishna's actions and became like him."
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवतम (1.9.40) का यह श्लोक उन में से एक है, जो भीष्म के अंतिम शब्दों को बताता है। भगवान श्री कृष्ण ने अपने रास-लीला और अन्य लीलाओं के दौरान अपने आकर्षक हाव-भाव और इशारों से गोपियों की पूजा करके उन्हें सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया। इसलिए गोपियों को भगवान की सबसे बड़ी भक्त के रूप में समझा जाना चाहिए, जो भगवान के सभी उपहारों के प्राप्तकर्ताओं से बड़ी हैं, जो भोग, शक्ति, मुक्ति और भक्ति के उपहारों से बड़ी हैं, और महालक्ष्मी से भी बड़ी हैं।

जब कृष्ण ने रास नृत्य की शुरुआत में गोपियों को छोड़ा, तो उनके परमानंद पागलपन में वे अंधे हो गए; दूसरे शब्दों में, उन्होंने इस दुनिया और अगली दुनिया में खुशी के साधनों और अंत को देखने की अपनी क्षमता खो दी। उस अवस्था में उन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठाने जैसी उनकी लीलाओं का अभिनय किया और उनके जैसे ही बन गए। कहने का अर्थ है, उन्होंने एक विशेष प्रकार की समाधि में प्रवेश किया जिसमें उनके शरीर ने उनके कई उत्कृष्ट गुणों (प्रकृतिम अगन) को ग्रहण किया। सत-चित-आनंद आध्यात्मिक प्रकृति में निश्चित गोपियाँ तब पूरे विश्व द्वारा पूजा के योग्य, ब्रह्मांड को मुक्ति दिलाने में सक्षम और सभी के लिए करुणा से भरी हुई दिखाई दीं।

या, प्रकृति शब्द का अर्थ "मन" और अगन का अर्थ "प्रवेश करना" लेते हुए, जब कृष्ण रास नृत्य से दूर थे तो गोपियाँ उनके मन में गहराई से प्रवेश कर गईं, और उनकी अनुपस्थिति को महसूस करते हुए उनकी अत्यधिक भक्ति के कारण वे उनके गहन ध्यान का उद्देश्य बन गईं। इसलिए गोपियों की इस तरह से महिमा की जाती है:

वियोगिनीनामपि पद्धतिं वः

न योगिनो गंतुमपि क्षमंते

यद् ध्येयरूपस्य परस्य पुंसो

यूयं गता ध्यान-पदं दुरापम्

"यहां तक ​​​​कि महान योगी भी परमेश्वर की पूजा करने की आपकी पद्धति का पालन करने में सक्षम नहीं हैं और उनके अभाव की भावना रखते हैं। वे ध्यान का उचित उद्देश्य हैं, लेकिन आप उनके उद्देश्य बन गई हैं। यह एक ऐसी सिद्धि है जिसे प्राप्त करना लगभग असंभव है।" (श्रील रूप गोस्वामी की पद्यावली, 351)

हालांकि कृष्ण सर्वोच्च लक्ष्य हैं, जिसे ब्रह्मा और अन्य देवताओं जैसे ब्रह्मांड के शक्तिशाली देवताओं, सनका और उनके भाइयों जैसे आत्म-संतुष्ट योगियों, नारद जैसे शुद्ध भक्तों और लक्ष्मी देवी जैसी प्रिय पत्नियों द्वारा शायद ही कभी हासिल किया गया है, कृष्ण वास्तव में गोपियों की पूजा करते हैं, उनके अभूतपूर्व और शानदार लीलाओं से उन्हें आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। जब गोपियाँ वियोग में अपने प्रेम की ऊंचाई पर पागल हो जाती हैं, तो वे सही और गलत का अंतर नहीं कर पाती हैं। और इसलिए वे कृष्ण की गतिविधियों की नकल करती हैं और कृष्ण के अपने दिमाग पर आक्रमण करती हैं। इस प्रकार वे निश्चित रूप से सभी वैष्णवों में सबसे महान हैं, और इन सबसे महान वैष्णवों की इच्छा का एकमात्र उद्देश्य बनने के लिए, कृष्ण को सर्वोच्च व्यक्ति होना चाहिए।

इस तरह सोचकर, भीष्म अपने शरीर से निकलते समय अपने शरीर से निकलते समय श्री गोपीनाथ उनके सामने उपस्थित रहें।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)