जब कृष्ण ने रास नृत्य की शुरुआत में गोपियों को छोड़ा, तो उनके परमानंद पागलपन में वे अंधे हो गए; दूसरे शब्दों में, उन्होंने इस दुनिया और अगली दुनिया में खुशी के साधनों और अंत को देखने की अपनी क्षमता खो दी। उस अवस्था में उन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठाने जैसी उनकी लीलाओं का अभिनय किया और उनके जैसे ही बन गए। कहने का अर्थ है, उन्होंने एक विशेष प्रकार की समाधि में प्रवेश किया जिसमें उनके शरीर ने उनके कई उत्कृष्ट गुणों (प्रकृतिम अगन) को ग्रहण किया। सत-चित-आनंद आध्यात्मिक प्रकृति में निश्चित गोपियाँ तब पूरे विश्व द्वारा पूजा के योग्य, ब्रह्मांड को मुक्ति दिलाने में सक्षम और सभी के लिए करुणा से भरी हुई दिखाई दीं।
या, प्रकृति शब्द का अर्थ "मन" और अगन का अर्थ "प्रवेश करना" लेते हुए, जब कृष्ण रास नृत्य से दूर थे तो गोपियाँ उनके मन में गहराई से प्रवेश कर गईं, और उनकी अनुपस्थिति को महसूस करते हुए उनकी अत्यधिक भक्ति के कारण वे उनके गहन ध्यान का उद्देश्य बन गईं। इसलिए गोपियों की इस तरह से महिमा की जाती है:
वियोगिनीनामपि पद्धतिं वः
न योगिनो गंतुमपि क्षमंते
यद् ध्येयरूपस्य परस्य पुंसो
यूयं गता ध्यान-पदं दुरापम्
"यहां तक कि महान योगी भी परमेश्वर की पूजा करने की आपकी पद्धति का पालन करने में सक्षम नहीं हैं और उनके अभाव की भावना रखते हैं। वे ध्यान का उचित उद्देश्य हैं, लेकिन आप उनके उद्देश्य बन गई हैं। यह एक ऐसी सिद्धि है जिसे प्राप्त करना लगभग असंभव है।" (श्रील रूप गोस्वामी की पद्यावली, 351)
हालांकि कृष्ण सर्वोच्च लक्ष्य हैं, जिसे ब्रह्मा और अन्य देवताओं जैसे ब्रह्मांड के शक्तिशाली देवताओं, सनका और उनके भाइयों जैसे आत्म-संतुष्ट योगियों, नारद जैसे शुद्ध भक्तों और लक्ष्मी देवी जैसी प्रिय पत्नियों द्वारा शायद ही कभी हासिल किया गया है, कृष्ण वास्तव में गोपियों की पूजा करते हैं, उनके अभूतपूर्व और शानदार लीलाओं से उन्हें आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। जब गोपियाँ वियोग में अपने प्रेम की ऊंचाई पर पागल हो जाती हैं, तो वे सही और गलत का अंतर नहीं कर पाती हैं। और इसलिए वे कृष्ण की गतिविधियों की नकल करती हैं और कृष्ण के अपने दिमाग पर आक्रमण करती हैं। इस प्रकार वे निश्चित रूप से सभी वैष्णवों में सबसे महान हैं, और इन सबसे महान वैष्णवों की इच्छा का एकमात्र उद्देश्य बनने के लिए, कृष्ण को सर्वोच्च व्यक्ति होना चाहिए।
इस तरह सोचकर, भीष्म अपने शरीर से निकलते समय अपने शरीर से निकलते समय श्री गोपीनाथ उनके सामने उपस्थित रहें।
