श्वाफल्क के पुत्र और भगवान कृष्ण के मामा अक्रूर एक वृद्ध पुरुष थे जिनका हृदय ज्ञान की निर्जीवता से सूख चुका था। उनके हृदय में दया की कोमलता इतनी कम हो गई थी कि वे कंस के कर्मठ सेनापति बनकर व्रज में आए।
Akrura, son of Shvaphalka and Lord Krishna's maternal uncle, was an old man whose heart had become parched by the lifelessness of knowledge. His compassionate tenderness had diminished so much that he came to Vraja as Kansa's diligent commander.
तात्पर्य
अक्रूर के नाम का अर्थ "निर्दयी नहीं" होता है, लेकिन कृष्ण को वृंदावन से ले जाने के लिए उन्होंने व्रजवासियों के ख़िलाफ़ निर्दयी अपराध किए। वह कृष्ण के चाचा हो सकते हैं, लेकिन उद्धव के अनुसार उनके दिल को भक्ति सेवा के रसों से अछूते ज्ञान द्वारा पूरी तरह से सुखा दिया गया था। बूढ़े होने के नाते, अक्रूर रसों का पारखी होने का दिखावा भी नहीं कर सके। और इसलिए, चूंकि उनके पास व्रज-प्रेम के उन्मादपूर्ण मिजाज़ के लिए कोई प्रशंसा नहीं थी, इसलिए उन्होंने कृष्ण को व्रज से दूर ले जाने का कार्य स्वीकार कर लिया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥