श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  2.5.181 
तत्रापि यो विशेषो ’न्यः
केषाञ्चित् को ’पि वर्तते
लोकानां किल तस्याहम्
आख्याने नाधिकारवान्
 
 
अनुवाद
श्री मदनगोपाल के कुछ भक्तों में और भी भेद हैं, परन्तु मैं उनका वर्णन करने के लिए अयोग्य हूँ।
 
There are other distinctions among some devotees of Sri Madangopal, but I am unqualified to describe them.
तात्पर्य
इहा नारद भगवद गीता की भाँति श्री मदन गोपाल की परम भक्ति की ध्वनि करते हैं, जो गोपियों के भाव से श्री कृष्ण जी की सेवा करनेवालों में होती है। इस अत्यन्त गोपनीय बात को कहने में वे उद्धव को अपने से अधिक अधिकारी समझते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)