श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 178
 
 
श्लोक  2.5.178 
तेषां परमहंसा ये
मुक्ताः स्युः केचिद् एव ते
केचिन् महाशयास् तेषु
भगवद्-भक्ति-तत्पराः
 
 
अनुवाद
मोक्ष के आकांक्षी लोगों में से, बहुत कम ही दिव्य, मुक्त आत्माएं होती हैं, और उन महान् अध्यात्मवादियों में से भी केवल कुछ ही भगवान की भक्ति के प्रति समर्पित होते हैं।
 
Of those who aspire for salvation, very few are divine, liberated souls, and even among those great spiritualists, only a few are devoted to the devotion of God.
तात्पर्य
जो व्यक्ति योग के अभ्यास में दृढ़ता से स्थापित होते हैं उन्हें हंस कहा जाता है, और जो व्यक्ति वास्तव में आत्मा को समझ चुके हैं उन्हें परमहंस कहा जाता है। परमहंस मुक्त होते हैं, परन्तु उनमें से अधिकांश अभी भी अपने संचित कर्मों के अवशेषों का आनंद ले रहे होते हैं। सभी परमहंसों में से, केवल कुछ ही पूर्ण रूप से सिद्ध होते हैं, और उन सिद्ध जीवों में से, केवल कुछ ही व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनकी भगवान के व्यक्तित्व की निस्वार्थ भक्ति सेवा के अलावा और कोई इच्छा नहीं होती है। वे संत, जो अति दुर्लभ हैं, वे अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि और गंभीर उद्देश्य वाले होते हैं; वे परमेश्वर की कृपा से यह समझते हैं कि मुक्ति कितनी महत्वहीन है। उन्हें भक्ति-रस के प्रति अपने असीमित और अमिश्रित उत्साह के कारण महाशय यानी बुद्धिमान आत्मा कहा जाता है।

जैसा कि श्री परीक्षित महाराज ने छठे काण्ड में श्रीमद्भागवतम (6.14.3-5) में श्री शुकदेव गोस्वामी से कहा था:

रजोभिः सम-सङ्ख्याताः

पार्थिवैरिह जन्तवः

तेषां ये केचनेह न्ते

श्रेयो वै मनुजाध्याः

इस भौतिक संसार में उतने ही जीवित प्राणी हैं जितने परमाणु हैं। इन जीवों में से, कुछ ही मानव हैं और उनमें से कुछ ही धार्मिक सिद्धांतों का पालन करने में रुचि रखते हैं।

प्रायो मुमुक्षवस तेषाम्

केच नेव द्विजोत्तमा

मुमुक्षूणां सहस्रेषु

कश्चिन मुच्येत सिद्ध्यति

हे उत्तम ब्राह्मण, शुकदेव गोस्वामी, कई व्यक्तियों में से जो धार्मिक सिद्धांतों का पालन करते हैं, केवल कुछ ही भौतिक दुनिया से मुक्ति की इच्छा रखते हैं। कई हजारों में से जो मुक्ति की इच्छा रखते हैं, एक व्यक्ति वास्तव में मुक्ति प्राप्त कर सकता है, समाज, दोस्ती, प्रेम, देश, घर, पत्नी और बच्चों से जुड़ी भौतिक आसक्ति को त्याग कर। और ऐसे कई हजारों मुक्त व्यक्तियों में से, कोई व्यक्ति जो मुक्ति के सही अर्थ को समझ सकता है, वह बहुत दुर्लभ है।

मुक्तानामपि सिद्धानाम्

नारायण-परायणः

सु-दुर्लभः प्रशान्तात्मा

कोटिष्वपि महामुने

"हे महान ऋषि, कई लाखों लोगों में से जो मुक्त हैं और मुक्ति के ज्ञान में पूर्ण हैं, कोई भगवान नारायण या कृष्ण का भक्त हो सकता है। ऐसे भक्त, जो पूरी तरह शांत रहते हैं, अत्यंत दुर्लभ हैं।" वैष्णवों को प्रशान्तात्म, "शांत मन वाले व्यक्ति," कहना एक अल्पमत है क्योंकि कृष्ण भावना का संतोष "शांति" के साधारण विचारों से बहुत आगे निकल जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)