जैसा कि श्री परीक्षित महाराज ने छठे काण्ड में श्रीमद्भागवतम (6.14.3-5) में श्री शुकदेव गोस्वामी से कहा था:
रजोभिः सम-सङ्ख्याताः
पार्थिवैरिह जन्तवः
तेषां ये केचनेह न्ते
श्रेयो वै मनुजाध्याः
इस भौतिक संसार में उतने ही जीवित प्राणी हैं जितने परमाणु हैं। इन जीवों में से, कुछ ही मानव हैं और उनमें से कुछ ही धार्मिक सिद्धांतों का पालन करने में रुचि रखते हैं।
प्रायो मुमुक्षवस तेषाम्
केच नेव द्विजोत्तमा
मुमुक्षूणां सहस्रेषु
कश्चिन मुच्येत सिद्ध्यति
हे उत्तम ब्राह्मण, शुकदेव गोस्वामी, कई व्यक्तियों में से जो धार्मिक सिद्धांतों का पालन करते हैं, केवल कुछ ही भौतिक दुनिया से मुक्ति की इच्छा रखते हैं। कई हजारों में से जो मुक्ति की इच्छा रखते हैं, एक व्यक्ति वास्तव में मुक्ति प्राप्त कर सकता है, समाज, दोस्ती, प्रेम, देश, घर, पत्नी और बच्चों से जुड़ी भौतिक आसक्ति को त्याग कर। और ऐसे कई हजारों मुक्त व्यक्तियों में से, कोई व्यक्ति जो मुक्ति के सही अर्थ को समझ सकता है, वह बहुत दुर्लभ है।
मुक्तानामपि सिद्धानाम्
नारायण-परायणः
सु-दुर्लभः प्रशान्तात्मा
कोटिष्वपि महामुने
"हे महान ऋषि, कई लाखों लोगों में से जो मुक्त हैं और मुक्ति के ज्ञान में पूर्ण हैं, कोई भगवान नारायण या कृष्ण का भक्त हो सकता है। ऐसे भक्त, जो पूरी तरह शांत रहते हैं, अत्यंत दुर्लभ हैं।" वैष्णवों को प्रशान्तात्म, "शांत मन वाले व्यक्ति," कहना एक अल्पमत है क्योंकि कृष्ण भावना का संतोष "शांति" के साधारण विचारों से बहुत आगे निकल जाता है।
