इस मार्ग पर, हर कोई समान स्तर की सफलता प्राप्त नहीं करता है। एक भक्त कृष्ण भावना को कृष्ण को देखने में सक्षम होने के बिंदु तक विकसित कर सकता है, लेकिन हो सकता है कि वह उसे अपने अंतरंग भक्तों के साथ वृंदावन के विशेष अतीत (तद्र्क-कृष्ण) का आनंद लेते हुए देखने में सक्षम न हो। जब अधिक उन्नत है, तो एक वैष्णव कभी-कभी कृष्ण को अपने वृंदावन अतीत में उलझा हुआ देख सकता है लेकिन अपने आनंदमय आनंद (सु-प्रसन्नम) के पूर्ण दायरे को प्रदर्शित नहीं करता है। और यहां तक कि ऐसा वैष्णव भी कृष्ण के शाश्वत अतीत में प्रवेश करने और कृष्ण के साथ पूर्ण स्वतंत्रता में खेलने के लिए भाग्यशाली नहीं हो सकता है। कृष्ण भावना की उच्चतम सिद्धि शायद ही कभी प्राप्त होती है।
