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श्लोक 2.5.161  |
तेषां तद्-आसक्तिर् अपि क्व वाच्या
ये नन्द-गोपस्य कुमारम् एनम्
प्रेम्णा विदन्तो बहु सेवमानाः
सदा महार्त्यैव नयन्ति कालम् |
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| अनुवाद |
| व्रजवासियों की कृष्ण के प्रति आसक्ति का वर्णन कौन कर सकता है? अपने शुद्ध प्रेम में वे उन्हें केवल नंदगोप के युवा पुत्र के रूप में ही जानते हैं। और उस प्रेम से पूर्णतः धन्य होते हुए भी, वे अपना सारा समय घोर क्लेश में बिताते हैं। |
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| Who can describe the attachment of the people of Vraja to Krishna? In their pure love, they know Him only as the young son of Nandagopa. And despite being completely blessed with that love, they spend all their time in intense suffering. |
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