श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  2.5.156 
सा मण्डली-बन्धन-चातुरी प्रभोः
सा नृत्य-गीतादि-कलासु दक्षता
सापूर्व-शोभाधिकता-परम्परा
मुष्णाति चेतो मम विश्व-मोहिनी
 
 
अनुवाद
भगवान की गोपियों को वृत्त में व्यवस्थित करने की चतुराई, नृत्य और गान जैसी कलाओं में उनकी निपुणता - एक के बाद एक, अभूतपूर्व वैभव की परिपूर्णताएँ - वे अद्भुत चीजें मेरे हृदय को हर लेती हैं और सम्पूर्ण जगत को मोहित कर लेती हैं।
 
The Lord's skill in arranging the gopis in a circle, His mastery of the arts of dance and song—one after another, perfections of unprecedented splendor—those wonderful things captivate my heart and captivate the entire universe.
तात्पर्य
"और इसी तरह" से व्यक्त करे जैसे कि नृत्य-गीतादि-कलासु शब्द में है, कृष्ण ने गोपियों के साथ शानदार प्रदर्शन के साथ नृत्य किया और गाया भी, परन्तु साथ ही में उन्होंने यमुना नदी में उनके साथ पानी के खेल भी खेले। ये कृत्य महान संतों जैसे कि नारद को आकर्षित करते हैं - और दुनिया के सभी लोगों को।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)