श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.5.15 
निजान्तिके मन्-नयनार्थम् आत्मनै-
वोत्थातु-कामेन पुरो ’र्पितस्य
पादाम्बुजस्योपरि मच्-छिरो बलात्
स्व-पाणिनाकृष्य बतोद्धवो न्यधात्
 
 
अनुवाद
तब भगवान ने मुझे उठाकर अपनी ओर खींचने की इच्छा से अपने चरण मेरे निकट रख दिए। और—ओह!—उद्धव ने अपने हाथों से मेरे सिर को उन चरणकमलों से दृढ़तापूर्वक स्पर्श किया।
 
Then the Lord, desiring to lift me up and draw me to Himself, placed His feet near me. And—oh!—Uddhava firmly touched my head with His hands to those feet.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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