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श्लोक 2.5.15  |
निजान्तिके मन्-नयनार्थम् आत्मनै-
वोत्थातु-कामेन पुरो ’र्पितस्य
पादाम्बुजस्योपरि मच्-छिरो बलात्
स्व-पाणिनाकृष्य बतोद्धवो न्यधात् |
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| अनुवाद |
| तब भगवान ने मुझे उठाकर अपनी ओर खींचने की इच्छा से अपने चरण मेरे निकट रख दिए। और—ओह!—उद्धव ने अपने हाथों से मेरे सिर को उन चरणकमलों से दृढ़तापूर्वक स्पर्श किया। |
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| Then the Lord, desiring to lift me up and draw me to Himself, placed His feet near me. And—oh!—Uddhava firmly touched my head with His hands to those feet. |
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