श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  2.5.138 
वाच्यः किम् एषां व्रज-चेष्टितानां
यः सर्वतः श्रैष्ठ्य-भरो विचारैः
तद्-अक्षराणां श्रवणे प्रवेशाद्
उदेति हि प्रेम-भरः प्रकृत्या
 
 
अनुवाद
व्रज में भगवान की इन लीलाओं के विषय में मैं क्या कहूँ? जो इनका ध्यानपूर्वक चिंतन करेगा, वह इन्हें सर्वथा श्रेष्ठ मानेगा। उन लीलाओं का वर्णन करते हुए शब्द कानों में पड़ते ही हृदय में स्वतः ही शुद्ध प्रेम की बाढ़ आ जाती है।
 
What can I say about these pastimes of the Lord in Vraja? Anyone who carefully contemplates them will find them to be supreme. The very words describing these pastimes automatically fill the heart with pure love.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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