श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.5.137 
व्रजस्य वैकुण्ठ-पदानुदर्शनं
लोकाच् च नन्दानयनं प्रचेतसः
न वक्तुम् अर्हामि परान्त-सीम-गां
वक्ष्ये कथं तां भगवत्त्व-माधुरीम्
 
 
अनुवाद
मैं व्रजवासियों को वैकुंठधाम दिखाने और वरुण लोक से नंद महाराज को छुड़ाने की उनकी परम उत्कृष्ट लीलाओं का वर्णन करने में असमर्थ हूँ। और जिस मधुरता से उन्होंने स्वयं को परम भगवान् के रूप में प्रकट किया, उसे मैं शब्दों में कैसे व्यक्त कर सकता हूँ?
 
I am unable to describe His most sublime pastimes of showing the inhabitants of Vraja the Vaikuntha-dham and rescuing Nanda Maharaja from Varuna-loka. And how can I express in words the sweetness with which He revealed Himself as the Supreme Lord?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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