श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 129
 
 
श्लोक  2.5.129 
क्व दुष्ट-चेष्टस्य खलस्य तस्य
दण्डस् तदा क्रोध-भरेण कार्यः
क्व चोन्नते तत्-फण-वर्ग-रङ्गे
नृत्योत्सवो हर्ष-भरेण तादृक्
 
 
अनुवाद
जब प्रभु का क्रोध भड़का, तो उन्होंने उस दुष्ट, क्रूर हृदय प्राणी को कैसा दण्ड दिया! और जब प्रभु ने उस सर्प के उठे हुए फन के मंच पर अपना नृत्य-महोत्सव मनाया, तो उन्हें कितना आनंद हुआ!
 
When the Lord's anger flared, how He punished that wicked, cruel-hearted creature! And how joyful the Lord was when He danced His own dance upon the stage of that serpent's raised hood!
तात्पर्य
कालिया में अपने मैले कुण्डलों से सर्वोच्च व्यक्ति के दिव्य शरीर को पकड़ने का अहंकार था, इस प्रकार भगवान के भक्तों को भारी चिंता हुई। कालिया का हृदय दुष्ट अभिमान से भरा था, और वह अपने फनों को हवा में ऊँचा उठाते हुए कोई शर्म नहीं महसूस करता था। इसलिए कृष्ण ने उसे उचित सजा दी: उसने कालिया के फनों को एक नृत्य मंच में बदल दिया और सांप को प्रसन्नता से पछाड़ दिया और गुलाम बना लिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)