श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  2.5.128 
यो वै विहारो ’जनि कालियस्य
ह्रदे यशोदा-तनयस्य तस्य
तं स्मर्तुम् ईशो न भवामि शोक-
प्रहर्ष-वेगात् कथम् आलपानि
 
 
अनुवाद
यशोदा के पुत्र ने कालिय सरोवर में जो क्रीड़ा की थी, वह मुझे दुःख और हर्ष दोनों से इतना विचलित कर रही है कि मैं उसे स्मरण भी नहीं कर सकता। फिर मैं उसे आपसे कैसे कहूँ?
 
The play that Yashoda's son played in the Kaliya lake is so distraught with both sorrow and joy that I cannot even recall it. How can I then tell you about it?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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