श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  2.5.125 
तत्-तद्-विलासास्पद-गोकुलस्य स
ब्रह्मैव माहात्म्य-विशेष-वित्तमः
अस्तौत् तथा यो भगवन्तम् आदरान्
मूर्तो महा-प्रेम-रसो व्रजस्य यः
 
 
अनुवाद
भगवान ब्रह्मा ने अन्य किसी की अपेक्षा गोकुल की विशेष महिमा को अधिक अच्छी तरह समझ लिया, जो समस्त लीलाओं का धाम है, अतः उन्होंने बड़े आदर के साथ उन परमेश्वर की स्तुति की, जो व्रज में शुद्ध प्रेम के उत्कृष्ट स्वाद के साकार स्वरूप हैं।
 
Lord Brahma understood better than anyone else the special glory of Gokula, the abode of all pastimes, and so with great respect he praised the Supreme Lord, who is the embodiment of the sublime taste of pure love in Vraja.
तात्पर्य
ब्रह्मा द्वारा कृष्ण से बुद्धि परीक्षा में हार जाने पर उनका न केवल दमन हुआ बल्कि गोकुल में कृष्ण के अतीत की समझ भी बढ़ी, इतना कि नारद ने उन्हें "माहात्म्य-विशेष-विश्रम" कहा, "गोकुल के विशेष गौरवों को जानने वाले सर्वश्रेष्ठ।" कृष्ण से उनकी वंदना में ब्रह्मा की समझ का प्रमाण मिलता है:

तद भूरी-भाग्यम इहा जन्म किम अप्य अटव्याम्

यद गोकुलेऽपि कतम अंग्री-रजोऽभिषेकम

यज्जीवितम तु निकलम भगवान मुकुंदस

त्व अध्यापि यत्पद-रजं श्रुति-मृग्म एव

"मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य होगा कि मैं इस गोकुल के किसी भी जंगल में किसी भी जन्म को ले लूं और मेरे सिर को किसी भी निवासियों के कमल चरणों से गिरने वाली धूल से नहलाया जाए। उनका पूरा जीवन और आत्मा भगवान मुकुंद परमात्मा हैं, जिनके कमल चरणों की धूल अभी भी वैदिक मंत्रों की तलाश में की जा रही है।" (भागवत 10.14.34)

ब्रह्मा द्वारा उन्हें व्रज-प्रेम के सभी उत्कृष्ट मूड के भंडार के रूप में महसूस करके कृष्ण की उचित प्रशंसा करने के लिए योग्य बना। भगवद-भागवतम के कई श्लोकों में श्री शुकादेव गोस्वामी उन रस की किस्मों का वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए:

तन्मात्रो वेणु-रव-त्वर-उत्थिता

उत्थाप्य दोर्भिः परि-रभ्य निर्भरम्

स्नेह-स्रुत-स्तन्य-पयः-सुधा-सवम्

मतवा परं ब्रह्म सुतान् अपाययन

"अपने बेटों द्वारा बजाए जा रहे बांसुरी और सींगों की आवाज सुनकर, लड़कों की माताएं तुरंत अपने घरेलू कामों से उठीं, अपने बेटों को अपनी गोद में उठाया, उन्हें दोनों बाहों से गले लगाया और अपने स्तन के दूध से उन्हें खिलाना शुरू किया, जो विशेष रूप से कृष्ण के लिए अत्यधिक प्रेम के कारण बहता था। वास्तव में कृष्ण ही सब कुछ हैं, लेकिन उस समय, अत्यधिक प्रेम और स्नेह व्यक्त करते हुए उन्हें कृष्ण, पर-ब्रह्म को खिलाने में विशेष आनंद आया और कृष्ण ने अपनी संबंधित माताओं से दूध पिया जैसे कि वह अमृत पेय था।" (भागवत 10.13.22)

ब्रह्मा ने भी अपनी प्रार्थनाओं में इन रसों का बहुत ही कुशलता से वर्णन किया:

अहो अति-धन्या व्रज-गो-रमण्याः

स्तन्यामृतं पीतम अतिव ते मुदा

यासां विभो वत्सतरत्मात्मनाम

यत्-तृप्तयेऽद्यापि ना चलम् अध्वाराः

"हे सर्वशक्तिमान भगवान, वृंदावन की गाय और महिलाएं कितनी भाग्यशाली हैं, जिनके स्तन-दूध का अमृत आपने अपने बछड़ों और बच्चों का रूप धारण करके अपने पूर्ण संतुष्टि के लिए खुशी-खुशी पिया है! अनादिकाल से लेकर आज तक किए गए सभी वैदिक बलिदानों ने आपको उतनी संतुष्टि नहीं दी।" (भागवत 10.14.31)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)