श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  2.5.123 
सरस्-तटे शाद्वल-जेमने या
लीला समाकर्षति सा मनो मे
तथा प्रभोस् तर्णक-मार्गणे या
दध्य्-ओदन-ग्रास-विलासि-पाणेः
 
 
अनुवाद
मेरा मन भगवान की उस लीला से पूरी तरह मोहित हो गया है जिसमें वे झील के घास वाले किनारे पर भोजन करते हैं और फिर बछड़ों को ढूंढने निकल पड़ते हैं, उनके हाथ में दही मिले चावल का एक टुकड़ा होता है।
 
My mind is completely captivated by the Lord's pastime of eating on the grassy bank of the lake and then setting out in search of the calves, with a piece of rice mixed with curd in his hand.
तात्पर्य
भगवान ब्रह्मा कृष्ण की महानता का परीक्षण करना चाहते थे, इसलिए जब कृष्ण अपने दोस्तों को दोपहर के भोजन के दौरान छोड़कर भटकते हुए बछड़ों को खोजने घने जंगल में गए, तो ब्रह्मा ने मौका पाकर बछड़ों और ग्वाल-बालों को भी उठा लिया। कृष्ण एक दोस्त की थाली से दही-चावल का एक लोंदा अभी-अभी लिए थे और उसे ले जाते हुए बछड़ों को खोजने चले गए थे। शुकदेव गोस्वामी कहते हैं:

वामे पाणौ मसृण-कवलं तत्-फलाण्य अंगुलीषु

"वह अपने हाथ में दही और चावल की एक बहुत अच्छी तैयारी रख रहे थे, जिसमें उनकी उंगलियों के बीच उपयुक्त फलों के टुकड़े थे।" (भागवतम 10.13.11)

इति उक्त्वाद्रि-दरी-कुंज-

गह्वरेष्व आत्म-वत्सकान

विचिन्वन् भगवान कृष्णः

सपाणि-कवलो ययौ

“’मुझे बछड़ों को खोजने जाने दो,’ कृष्ण ने कहा। ’अपने आनंद को भंग मत करो।’ फिर, अपने हाथ में दही और चावल लेकर, भगवान कृष्ण तुरंत अपने दोस्तों के बछड़ों को खोजने के लिए निकल गए। अपने दोस्तों को खुश करने के लिए, उन्होंने सभी पहाड़ों, झाड़ियों, पहाड़ी गुफाओं और संकरे रास्तों में खोजबीन शुरू की।" (भागवतम 10.13.14)

वास्तव में, कृष्ण अभी भी एक साल बाद अपने हाथ में उस निवाले को पकड़े हुए थे, जब ब्रह्मा माफी मांगने आए थे। भगवान ब्रह्मा ने कहा:

नौमीड्य ते ’भ्र-वपुषे तडिद-अंबरāya

गुंजावतमंस-परिपिच्छ-लसन-मुखाय

वन्य-स्रजे कवल-वेत्र-विषाण-वेणु-

लक्ष्म-श्रिये मृदु-पदे पशुपांगजाया

“मेरे प्रिय भगवान, आप ही पूजनीय भगवान, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं और इसलिए मैं केवल आपको प्रसन्न करने के लिए अपनी विनम्र प्रार्थना और प्रार्थना करता हूं। हे ग्वालों के राजा के पुत्र, आपका पारलौकिक शरीर एक नए बादल की तरह गहरा नीला है, आपका वस्त्र बिजली की तरह चमकदार है, और आपके चेहरे की सुंदरता आपके गुंजा के झुमके और आपके सिर पर मोर पंख से बढ़ी है। विभिन्न जंगली फूलों और पत्तियों की माला पहने हुए, और एक चरवाहों की छड़ी, एक भैंस का सींग और एक बांसुरी से सुसज्जित, आप अपने हाथ में भोजन का एक निवाला लेकर खूबसूरती से खड़े हैं।" (भागवतम 10.14.1)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)