श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  2.5.122 
प्रातः स-वत्सः सखिभिः प्रविष्टो
वृन्दावनं यान् अकरोद् विहारान्
तत्-तत्-परामर्श-महाहि-वक्त्र-
प्रवेशनादीन् स-रसान् भजे तान्
 
 
अनुवाद
मैं उनकी उन लीलाओं की पूजा करता हूँ जो उन्होंने प्रातःकाल में की थीं, जब वे अपने बछड़ों और मित्रों के साथ वृन्दावन वन में प्रवेश कर रहे थे - वे अत्यंत आनन्ददायक लीलाएँ थीं, जैसे अनेक प्रकार से चिन्तन करने के पश्चात् विशाल सर्प के मुख में प्रवेश करना।
 
I worship His pastimes that He performed in the morning, when He was entering the Vrindavan forest with His calves and friends—they were extremely delightful pastimes, like entering the mouth of a huge serpent after meditating in many ways.
तात्पर्य
जो सुबह गाय चराने के लिए एक आम दिन के रूप में शुरू हुई, उस पर एक विशालकाय सांप के रूप में शक्तिशाली दानव अघ का सामना कृष्ण के चरवाहा मित्रों से हुआ। वन के उत्सव की पोशाक से खुद को सजाए ये लड़के काफ़ी चंचल मूड में थे। एक-दूसरे के लंच बैग चुराकर और बंदर और अन्य जानवरों को छेड़कर खुद को मनोरंजीत करने के बाद वे किसी और खेल की तलाश में थे, तभी उन्होंने अघ को रास्ते पर लेटे हुए देखा, जिसका मुंह खुला हुआ था और उन्हें अंदर घुसने के लिए आमंत्रित कर रहा था। कृष्ण ने असहाय रूप से देखा क्योंकि वे दानव के मुँह में दाखिल हो गए, और वह सोचने लगे:

kṛtyaṁ kim atrāsya khalasya jīvanaṁ

na vā amīṣāṁ ca satāṁ vihiṁsanam

dvayaṁ kathaṁ syād iti saṁvicintya

jñātvāviśat tuṇḍam aśeṣa-dṛg ghariḥ

‘‘अब क्या किया जाए? इस दानव को मारने और भक्तों को बचाने दोनों का कार्य एक साथ कैसे किया जा सकता है?’’ असीमित रूप से शक्तिशाली होने के कारण, कृष्ण ने बुद्धिमानी भरे उपायों का इंतजार करने का फैसला किया जिससे वह लड़कों को बचा सकें और साथ ही दानव का वध कर सकें। फिर वह अघासुर के मुंह में घुस गया। (भागवतम 10.12.28)

ये लीलाएँ प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान के सभी विभिन्न रसों से भरी हुई हैं, और इस प्रकार वे इसे सुनने वाले के दिल को मोह लेती हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)