kṛtyaṁ kim atrāsya khalasya jīvanaṁ
na vā amīṣāṁ ca satāṁ vihiṁsanam
dvayaṁ kathaṁ syād iti saṁvicintya
jñātvāviśat tuṇḍam aśeṣa-dṛg ghariḥ
‘‘अब क्या किया जाए? इस दानव को मारने और भक्तों को बचाने दोनों का कार्य एक साथ कैसे किया जा सकता है?’’ असीमित रूप से शक्तिशाली होने के कारण, कृष्ण ने बुद्धिमानी भरे उपायों का इंतजार करने का फैसला किया जिससे वह लड़कों को बचा सकें और साथ ही दानव का वध कर सकें। फिर वह अघासुर के मुंह में घुस गया। (भागवतम 10.12.28)
ये लीलाएँ प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान के सभी विभिन्न रसों से भरी हुई हैं, और इस प्रकार वे इसे सुनने वाले के दिल को मोह लेती हैं।
