श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  2.5.117 
या सा तृणावर्त-वधेन लीला
तस्याथ या रिङ्गण-भङ्गिकाभिः
त्वां पातु गोपी-गण-तोषणाय
कृता च या गो-रस-मोषणेन
 
 
अनुवाद
तृणावर्त का वध करने, मनोहर ढंग से रेंगने तथा गोपियों को संतुष्ट करने के लिए मक्खन और दही चुराने की उनकी लीलाओं से आप सुरक्षित रहें।
 
May you be protected from His pastimes of killing Trinavarta, crawling gracefully and stealing butter and curd to satisfy the gopis.
तात्पर्य
वह सर्वनाम या सा ("ठीक वैसे ही") सूचित करता है कि ये लीलाएँ अति प्रसिद्ध, अति आश्चर्यजनक, और अति आकर्षक हैं। श्री नारद प्रार्थना करते हैं कि ये लीलाएँ गोप-कुमार की रक्षा करें - उन्हें सभी प्रकार के डर से बचाएँ, और शायद कृष्ण की शैशव लीलाओं को सुनने से होने वाले आनंद से बहुत अधिक विचलित न होने दें।

नारद मुनि की प्रस्तुति अब वृंदावन में कृष्ण की लीलाओं की मधुरता पर केंद्रित है। उन्होंने इस मधुरता को उजागर न करने वाली लीलाओं का उल्लेख छोड़ दिया है, जैसे कि गर्ग ऋषि द्वारा किया गया नामकरण समारोह। उस लीला में कृष्ण ने कुछ ख़ास नहीं किया, जिसमें गर्ग ने नंदा और यशोदा को कृष्ण की महिमा के बारे में बताया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)