श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  2.5.109 
यत् तात तासाम् अपि धैर्य-मोषकं
या वै कुल-स्त्री-कुल-पूजिताङ्घ्रयः
रूपेण शीलेन गुणेन कर्मणा
श्रैष्ठ्यं गता हन्त महा-श्रियो ’पि याः
 
 
अनुवाद
हे बालक, सौंदर्य, चरित्र, गुण और आचरण में व्रज की स्त्रियाँ महालक्ष्मी से भी श्रेष्ठ थीं। सभी प्रतिष्ठित कुलों की स्त्रियाँ उनके चरणों की पूजा करती थीं। फिर भी, कृष्ण के सौंदर्य ने व्रज की स्त्रियों का संयम छीन लिया।
 
O child, the women of Vraja were superior to Mahalakshmi in beauty, character, virtue, and conduct. Women from all esteemed families worshipped her feet. Yet, Krishna's beauty took away the restraint of the women of Vraja.
तात्पर्य
गोपा कुमार को इस महत्वपूर्ण वर्णन को ध्यान से सुनने के लिए प्रेरणा देने के लिए नारद यहाँ स्नेहात्मक शब्द तात (" मेरे प्रिय पुत्र") का उपयोग करते हैं।

कृष्ण के सौन्दर्य ने गोपियों के धार्मिक सिद्धांतों को बनाए रखने के निश्चय को हिला दिया, परन्तु इसलिए नहीं कि गोपियाँ केवल स्त्रियाँ थीं, जिनके स्वभाव से अस्थिर माना जाता है। वृज की गोपियाँ एक सम्मानित समाज में प्रतिष्ठित सभ्य महिलाएँ थीं, इसलिए वे लापरवाह व्यवहार के लिए इच्छुक नहीं थीं। वे लक्ष्मी के समान थीं, नारियों में श्रेष्ठ, और उनसे भी बेहतर: वे अधिक सुंदर थीं, और अपने गंभीरता और शर्म में अधिक उदात्त, वे उचित निर्णय लेने में अधिक सक्षम थीं, दृढ़ निश्चय बनाए रखती थीं, और सभी प्रकार की परिस्थितियों से विशेषज्ञता से निपटती थीं, और वे अपने प्रिय की आराधना की विभिन्न गतिविधियों में अधिक सक्षम थीं। इसलिए नारद अपने आश्चर्य और प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए हन्त ("वास्तव में") का प्रयोग करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)