श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  2.5.107 
गो-दाम-वीथाभिर् उदूखलाङ्घ्रौ
स्वस्योदरे बन्धनम् आददे ’सौ
प्रोत्साहनेन व्रज-योषितां तन्-
नृत्यादिकं तां च निदेश-वर्तिताम्
 
 
अनुवाद
उन्होंने अपने पेट को गायों को बाँधने वाली रस्सियों से ओखली के तले में बाँध दिया। और व्रज की स्त्रियों को उत्साहित करने के लिए उन्होंने नृत्य किया, अन्य प्रकार से उनका मनोरंजन किया और उनकी आज्ञाओं का पालन किया।
 
He tied his stomach to the bottom of the mortar with ropes used to tie cows. And to cheer up the women of Vraja, he danced, entertained them in other ways, and obeyed their commands.
तात्पर्य
टेक्स्ट 103 में जब नारद ने कृष्ण की व्रज-भूमि में उत्कृष्टताओं को सूचीबद्ध किया, तो उन्होंने कृष्ण की अपने भक्तों के अधीनता को सबसे अंत में रखा, लेकिन यहाँ वह इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने का अवसर लेते हैं, क्योंकि वह कृष्ण की दया के विषय पर निकटता से संबंधित है।

जब माँ यशोदा कृष्ण को बांधकर उन्हें दंडित करना चाहती थीं, तो उन्होंने उपलब्ध सभी रस्सियों को जोड़ा, जिसमें दूध दुहने पर गायों को बाँधने वाली रस्सी भी शामिल थी, लेकिन फिर भी वह अपने बेटे को बांधने के लिए पर्याप्त लंबी रस्सी नहीं बना सकीं:

एवं स्व-गेह-दामामि

यशोदा संदधती अपि

गोपीनां सु-स्मयन्तीनां

स्मयती विस्मिताभवत्

"इस प्रकार माता यशोदा ने घर में जो भी रस्सियाँ मिलीं, उन सभी को जोड़ दिया, पर फिर भी कृष्ण को बाँधने के अपने प्रयास में असफल रहीं। मां यशोदा की सहेलियाँ, पड़ोस की बुजुर्ग गोपियाँ, मुस्कुरा रही थीं और मौज-मस्ती का आनंद ले रही थीं। इसी तरह, माता यशोदा, यद्यपि इस तरह काम कर रही थीं, वह भी मुस्कुरा रही थीं। वे सभी आश्चर्य से स्तब्ध थे।" (भागवतम् 10.9.17)

अंततः कृष्ण ने खुद को बंधे रहने के लिए सहमत हो गए, लेकिन इस तरह से-रस्सी के एक सिरे पर उनकी कमर और दूसरे सिरे पर एक बड़ा पीसने वाला मोर्टार-कि वह बाद में मोर्टार को पलट सकते थे और अधिक मक्खन चुराने के लिए इसके चौड़े आधार पर चढ़ सकते थे। श्रीमद्-भागवतम् (10.9.18-19) में श्री शुकदेव गोस्वामी बताते हैं:

स्व-मातुः स्विन्न-गात्राया

विस्स्रस्त-कबर-स्रजः

दृष्ट्वा परिश्रमं कृष्णः

कृपयासीत स्व-बंधने

एवं सन्दर्शिता ह्यंगा

हरिणा भृत्य-वश्यता

स्व-वशेनापि कृष्णेन

यस्येदम् शेश्वरं वशे

"माता यशोदा के कठोर परिश्रम के कारण, उनका पूरा शरीर पसीने से तर हो गया, और उनके बालों से फूल और कंघी गिर रहे थे। जब बालक कृष्ण ने अपनी माता को इस तरह थके हुए देखा, तो वह उनके प्रति दयालु हो गए और बंधने के लिए सहमत हो गए। हे महाराज परीक्षित, यह संपूर्ण ब्रह्मांड, भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा और भगवान इंद्र जैसे अपने महान, महान देवताओं के साथ, भगवान के व्यक्तित्व के परम नियंत्रण में है। फिर भी परम भगवान के पास एक पारलौकिक विशेषता है: वह अपने भक्तों के नियंत्रण में आते हैं। यह अब इस लीला में कृष्ण द्वारा प्रदर्शित किया गया था।"

व्रज की महिलाएँ इन लीलाओं को देखकर प्रसन्न हुईं, और कृष्ण ने उनके आनंद के लिए हरकतें करके और उनकी आज्ञाओं का पालन करके उनके लिए अपने प्रेम को और अधिक प्रोत्साहित किया। यह भी शुकदेव गोस्वामी द्वारा वर्णित है:

गोपीभिः स्तोभितो नृत्यद्

भगवान बाल-वत् क्वचित

उद्गायाति क्वचिन मुग्धः

तद्-वशो दारु-यंत्र-वत

"गोपियाँ कहती थीं, 'यदि तुम नाचोगे, मेरे प्रिय कृष्ण, तो मैं तुम्हें आधा मिठाई दूंगी।' ये शब्द कहकर या अपने हाथों को ताली बजाकर सभी गोपियों ने कृष्ण को विभिन्न तरीकों से प्रोत्साहित किया। ऐसे समय में, यद्यपि वह भगवान के परम शक्तिशाली व्यक्तित्व थे, वह मुस्कुराते थे और उनकी इच्छा के अनुसार नृत्य करते थे, जैसे कि वह उनके हाथों में एक लकड़ी की गुड़िया थे। कभी-कभी वह उनकी आज्ञा पर बहुत ऊँचे स्वर में गाते थे। इस प्रकार, कृष्ण पूरी तरह से गोपियों के नियंत्रण में आ गए।

बिभर्ति क्वचिदाज्ञप्तः

पीठकोंमान-पादुक्रम

बाहु-क्षेपं च कुरुते

स्वनाम च प्रीतिम आहन

"कभी-कभी माता यशोदा और उनकी गोपी सहेलियाँ कृष्ण से कहती थीं, 'यह वस्तु लाओ' या 'वह वस्तु लाओ।' कभी-कभी वह उन्हें लकड़ी का तख्ता, लकड़ी के जूते, या लकड़ी का मापने का बर्तन लाने का आदेश देते थे, और कृष्ण, जब इस प्रकार माताओं द्वारा आदेश दिया जाता था, तो उन्हें लाने की कोशिश करते। हालाँकि, कभी-कभी, जैसे कि इन चीजों को उठाने में असमर्थ हों, वह उनको छूते और वहीं खड़े हो जाते। बस अपने रिश्तेदारों के आनंद को आमंत्रित करने के लिए, वह अपनी ताकत दिखाने के लिए अपनी बाँहों से अपने शरीर पर प्रहार करते।

दर्शयंस्तद्-विदां लोक

आत्मनो भृत्य-वश्यताम्

व्रजस्योवाहा वै हर्षम्

भगवान बाल-चेष्ठितैः

"दुनिया भर में शुद्ध भक्तों के लिए जो उनकी गतिविधियों को समझ सकते थे, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण ने प्रदर्शित किया कि वह अपने भक्तों, अपने सेवकों के द्वारा कितने वशीभूत हो सकते हैं। इस तरह उन्होंने अपने बचपन की गतिविधियों से व्रज-वासियों के आनंद को बढ़ाया।"(भागवतम् 10.11.7-9)

इन लीलाओं द्वारा भगवान कृष्ण ने ज्ञानियों को एक स्पष्ट संदेश भेजा जो सोचते हैं कि वे उन्हें परम सत्य के रूप में अच्छी तरह से जानते हैं: "ज्ञान की प्रक्रिया के माध्यम से मुझे प्राप्त करना बिल्कुल भी आसान नहीं है। केवल भक्ति से ही मुझे शीघ्र प्राप्त किया जाता हूँ।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)