श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  2.5.105 
यस्यैक-वृक्षो ’पि निजेन केनचिद्
द्रव्येण कामांस् तनुते ’र्थिनो ’खिलान्
तथापि तत् तन् न सदा प्रकाशयेद्
ऐश्वर्यम् ईशः स्व-विहार-विघ्नतः
 
 
अनुवाद
व्रज भूमि में कोई भी वृक्ष अपने किसी भी भाग से, मांगने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूरी कर सकता है। फिर भी भगवान सदैव व्रज में अपना ऐश्वर्य प्रदर्शित नहीं करते, क्योंकि इससे उनकी लीलाओं के आनंद में बाधा आ सकती है।
 
Any tree in Vraja land can fulfill any wish of the one who asks, from any part of it. Yet, the Lord does not always display His opulence in Vraja, as this would interfere with the enjoyment of His pastimes.
तात्पर्य
व्रज की समृद्धि के एक सरल उदाहरण के रूप में, वहाँ के पेड़ भी एक फल, एक फूल या अपने शरीर के किसी भी अंग से सभी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, जो व्यक्ति उन पेड़ों के पास जाता है, उसकी जीवन की महत्वाकांक्षाएँ पूरी हो जाती हैं। इसका वर्णन श्रीमद-भागवतम (10.22.34) में स्वयं भगवान के व्यक्तित्व द्वारा किया गया है:

पत्र-पुष्प-फल-छाया-

मूल-वलकल-दारुभिः

गंध-निर्यास-भस्मास्थि-

तोकमैः कामान वितन्वते

"ये पेड़ अपनी पत्तियों, फूलों और फलों, अपनी छाया, जड़ों, छाल और लकड़ी से, और अपनी सुगंध, रस, राख, गूदे और शूट के साथ भी किसी की इच्छाओं को पूरा करते हैं।"

यदि व्रज के पेड़ भी ऐसी अद्भुत शक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं, तो व्रज के वैभव को कैसे गुप्त रखा जा सकता है? और फिर व्रज कैसे सर्वोच्च भगवान के लिए एक साधारण व्यक्ति के रूप में लीलाओं का आनंद लेने के लिए एक उपयुक्त स्थान हो सकता है? व्रज उपयुक्त है क्योंकि भगवान उन वैभवों को केवल चुनिंदा उदाहरणों में प्रकट करते हैं, जब वे उनके उद्देश्यों के लिए उपयोगी होते हैं। यदि उनकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं है तो वह उन्हें छिपा कर रखता है। इस प्रकार, ईश्वरत्व के वैभव को केवल कभी-कभी व्रज में देखा जाता है, हालाँकि ग्वालों के प्रिय के रूप में भगवान की आकर्षक लीलाएँ हमेशा विस्तार कर रही हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)