श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  2.4.97 
अहो सुखं कीदृग् इदं दुरूहम्
अहो पदं कीदृग् इदं महिष्ठम्
अहो महाश्चर्य-तरः प्रभुश् च
कीदृक् तथाश्चर्य-तरा कृपास्य
 
 
अनुवाद
अहा, कैसा अकल्पनीय सुख! कैसा परमधाम! कैसा अद्भुत गुरु! और उनकी दया कितनी अद्भुत है!
 
Ah, what unimaginable bliss! What a supreme abode! What a wonderful Guru! And how marvelous is His mercy!
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas