श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.4.86 
श्रीमद्-गोवर्धने तस्मिन्
निज-प्रियतमास्पदे
स्वयम् एवाभवं तात
जयन्ताख्यः स ते गुरुः
 
 
अनुवाद
हे बालक, उस दिव्य गोवर्धनलोक में, जो मेरा परम प्रिय धाम है, मैं स्वयं तुम्हारा गुरु बना, जिसे जयंत नाम से जाना जाता है।
 
O child, in that transcendental Govardhana-loka, which is my most beloved abode, I myself became your Guru, known by the name Jayanta.
तात्पर्य
भगवान विद्रोही जीवों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। वह उनको सुधारने की ज़िम्मेदारी वैद्यों और वैष्णवों पर छोड़ देते हैं। परंतु अंततः आत्माओं को बचाने वाली उनकी दया ही है। गोपकुमार के कर्म में परम प्रभु ने तब हस्तक्षेप किया जब उन्होंने गोवर्धन पहाड़ी पर गोपकुमार को जन्म दिलाया। भगवान ब्रह्मा के शब्दों में,

येषाम् स एष भगवान दयायद अनंत:

सर्वात्मनाश्रित-पदो यदि निर्व्यलीकम्

ते दुस्तराम अतितरन्ति च देव-मायाम्

नैषाम् मामहमिति धी: श्व-शृगाल-भक्ष्ये

“जो कोई भी भगवान के प्रति भक्ति में पूर्ण रूप से समर्पित होकर उनके अनुग्रह को प्राप्त करता है, वह माया के दुर्गम सागर को पार कर सकता है और उन्हें समझ सकता है। पर जो लोग मृत्यु के बाद कुत्तों और गीदड़ों द्वारा खाए जाने वाले शरीर से जुड़े होते हैं, वे ऐसा नहीं कर सकते।” (श्रीमद्-भागवतम् 2.7.42) केवल तभी जब भगवान श्री कृष्ण अपनी बिना शर्त कृपा का वरदान देते हैं तो कोई भगवान के चरणों की पूरी शरण ले सकता है और माया के सागर को पार कर सकता है, अन्यथा जिसे पार करना असंभव है। दूसरे अध्याय के इस छंद में, क्रिया “अतितरन्ति” (“वे पार कर जाते हैं”) के बाद “और” शब्द आता है, जिसका तात्पर्य है कि मुक्ति के अलावा भगवान के समर्पित भक्त श्री वैकुंठ भी प्राप्त करते हैं, एक उपलब्धि जो मुक्ति को अप्रासंगिक बना देती है। इस प्रकार, वैकुंठ उन लोगों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है जिनकी आत्म-पहचान कुत्तों और गीदड़ों द्वारा खाए जाने के लिए बने भौतिक शरीर में नहीं, बल्कि भगवान के समर्पित सेवकों के साथ उनकी संगति में है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)