येषाम् स एष भगवान दयायद अनंत:
सर्वात्मनाश्रित-पदो यदि निर्व्यलीकम्
ते दुस्तराम अतितरन्ति च देव-मायाम्
नैषाम् मामहमिति धी: श्व-शृगाल-भक्ष्ये
“जो कोई भी भगवान के प्रति भक्ति में पूर्ण रूप से समर्पित होकर उनके अनुग्रह को प्राप्त करता है, वह माया के दुर्गम सागर को पार कर सकता है और उन्हें समझ सकता है। पर जो लोग मृत्यु के बाद कुत्तों और गीदड़ों द्वारा खाए जाने वाले शरीर से जुड़े होते हैं, वे ऐसा नहीं कर सकते।” (श्रीमद्-भागवतम् 2.7.42) केवल तभी जब भगवान श्री कृष्ण अपनी बिना शर्त कृपा का वरदान देते हैं तो कोई भगवान के चरणों की पूरी शरण ले सकता है और माया के सागर को पार कर सकता है, अन्यथा जिसे पार करना असंभव है। दूसरे अध्याय के इस छंद में, क्रिया “अतितरन्ति” (“वे पार कर जाते हैं”) के बाद “और” शब्द आता है, जिसका तात्पर्य है कि मुक्ति के अलावा भगवान के समर्पित भक्त श्री वैकुंठ भी प्राप्त करते हैं, एक उपलब्धि जो मुक्ति को अप्रासंगिक बना देती है। इस प्रकार, वैकुंठ उन लोगों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है जिनकी आत्म-पहचान कुत्तों और गीदड़ों द्वारा खाए जाने के लिए बने भौतिक शरीर में नहीं, बल्कि भगवान के समर्पित सेवकों के साथ उनकी संगति में है।
