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श्लोक 2.4.82  |
बहूनि गमितान्य् अङ्ग
जन्मानि भवता सखे
कथञ्चिद् अपि मय्य् आभि-
मुख्यं किञ्चिद् अकारि न |
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| अनुवाद |
| मेरे प्रिय मित्र, तुमने कई जन्म मुझ पर ध्यान दिए बिना ही बिता दिए हैं। |
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| My dear friend, you have spent many lifetimes without paying attention to me. |
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