| श्री बृहत् भागवतामृत » खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य » अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत) » श्लोक 75 |
|
| | | | श्लोक 2.4.75  | स्व-भक्त-वर्गस्य तद्-एक-चेतसः
कदाचिद् आनन्द-विशेष-वृद्धये
प्रसार्य पादाम्बुज-युग्मम् आत्मनः
समर्पणेनैव लसन्तम् अद्भुतम् | | | | | | अनुवाद | | अपने भक्तों के, जिनका हृदय केवल उन्हीं में लगा रहता है, विशेष आनन्द में वृद्धि करने के लिए भगवान् समय-समय पर अपने दोनों चरणकमलों को उनके समक्ष समर्पित कर देते थे। इस प्रकार वे अपना तेज प्रकट करते थे। | | | | To increase the special joy of His devotees, whose hearts are focused solely on Him, the Lord would occasionally offer His two lotus feet to them. In this way, He would manifest His effulgence. | | ✨ ai-generated | | |
|
|