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श्लोक 2.4.68  |
कौस्तुभाभरण-पीन-वक्षसं
कम्बु-कण्ठ-धृत-मौक्तिकावलिम्
सस्मितामृत-मुखेन्दुम् अद्भुत-
प्रेक्षणोल्लसित-लोचनाम्बुजम् |
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| अनुवाद |
| उनके चौड़े वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि, शंख-सी गर्दन पर मोतियों की माला और चन्द्रमा के समान मुख पर अमृतमयी मुस्कान थी। उनके कमल-नेत्र चंचल चितवन से सजीव थे। |
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| He wore the Kaustubha gem on his broad chest, a pearl necklace around his conch-like neck, and a moon-like face that bore a nectar-like smile. His lotus eyes were alive with playful glances. |
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