श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  2.4.61 
अथ तैः पार्षदैः स्निग्धैर्
असाधारण-लक्षणम्
प्रभोर् विज्ञापितो ’हं च
शिक्षितः स्तवनादिकम्
 
 
अनुवाद
अंततः, मेरे मार्गदर्शक परम प्रभु के दयालु सेवकों ने मुझे प्रभु को पहचानने के विशेष संकेत बताए। उन्होंने मुझे यह भी सिखाया कि कौन सी प्रार्थनाएँ पढ़नी हैं और कौन से शिष्टाचार का पालन करना है।
 
Finally, my guides, the kind servants of the Supreme Lord, showed me the special signs to recognize the Lord. They also taught me which prayers to recite and what etiquette to follow.
तात्पर्य
गोपा-कुमार के अनुरक्षकों ने उसे भगवान नारायण के अद्वितीय दृश्य चिह्नों के बारे में बताया, जैसे उनके सीने पर श्रीवत्स चिह्न। इन कुछ विशेष विशेषताओं के अलावा, वैकुंठ में भगवान अपने भक्तों से अप्रभेद्य होते हैं जो सारूप्य की पूर्णता दिखाते हैं। गोपा-कुमार के लिए वास्तविक सहानुभूति के कारण, उनके मार्गदर्शकों ने उन्हें सिखाया कि भगवान नारायण के सामने कैसा व्यवहार करना चाहिए - पहले झुकना चाहिए और फिर कुछ दूरी पर खड़ा होना चाहिए, हथेलियाँ जोड़कर, भगवान के चरण-कमल की ओर देखना, हिलना-डुलना बंद करना या शारीरिक परिवर्तन प्रदर्शित करना, और इसी तरह।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)