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श्लोक 2.4.51  |
न कश्चित् प्रभवेद् बोद्धुं
सम्यक् स्वानुभवं विना
एतन्-मात्रं हि शक्येत
निरूपयितुम् अञ्जसा |
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| अनुवाद |
| प्रत्यक्ष अनुभव के बिना कोई भी वैकुंठ को ठीक से नहीं समझ सकता। इससे अधिक मैं उसका सटीक वर्णन नहीं कर सकता। |
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| Without direct experience, no one can truly understand Vaikuntha. I cannot describe it more accurately than this. |
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